इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरे राज्य की भर्ती प्रक्रिया का हवाला दे कर निर्धारित माध्यम से इतर आवेदन करना गंभीर भूल है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक हाईकोर्ट के निर्णय दूसरे के लिए प्रेरक हो सकते हैं, बाध्यकारी नहीं।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने रंजना देवी की याचिका खारिज कर दी। याची ने उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा के लिए आवेदन किया था। लेकिन उसकी उम्मीदवारी इस आधार पर रद्द कर दी गई कि उन्होंने अपना आवेदन संबंधित जिला न्यायाधीश या रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम अग्रसारित नहीं कराया था।
इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दावा किया कि यह एक छोटी सी मामूली विसंगति है, जिसे सुधारा जा सकता है। उन्होंने पटना हाईकोर्ट की भर्ती प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां उम्मीदवारों को त्रुटियां सुधारने का अवसर दिया जाता है।
कोर्ट ने दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि उत्तर प्रदेश उच्च न्यायिक सेवा नियम, 1975 के नियम 17(2) और 17(3) का अनुपालन अनिवार्य है। इसके तहत आवेदन पत्र का नियमों के अनुसार प्रस्तुत न किया जाना और जिला न्यायाधीश से अग्रेषित न किया जाना एक ऐसा दोष है, जिसे सुधारा नहीं जा सकता। यह कोई मामूली त्रुटि नहीं है, जिसे नजरअंदाज किया जाए।
बिहार न्यायिक सेवा के नियमों पर दी गई दलील पर कोर्ट ने स्पष्ट भी किया। कहा कि प्रत्येक हाईकोर्ट अपने प्रशासनिक कार्यों और नियुक्तियों का नियम बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। भर्ती प्रक्रिया की शुचिता और नियमों की एकरूपता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सभी उम्मीदवार अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन करें।
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